Saturday, 18 January 2014

Heavy snowfall in Uttrakhand : 
बर्फ ही बर्फ !  

लो जी देहरादून में भी हो गए वर्फीली चोटियों के दर्शन , ये नजारा है देहरादून तेगबहादुर रोड स्थित मेरे घर की छत का ठीक सामने दिखाई दे रही हैं मसूरी की पहाड़ियां , इस दिलकश नज़ारे को कौन नहीं देखना चाहेगा , तभी तो हमारे पडोसी 83 वर्षीय बराल अंकल भी पहुँच गए छत पे इस शानदार नज़ारे को देखने। और मेरी दोनों छुटकियां मनस्विनी और यशस्विनी तो फोटो खिचवाने के लिए पहाड़ के सामने ही खड़े हो गए। और अब इनकी जिद्द है कि हमें भी उस दूर पहाड़ पर जा कर बर्फ को छूना है। और मैंने भी वादा कर ही दिया है कि फ़रवरी माह में दोनों को औली जरुरु ले जाउंगा 
By - Shashi Bhushan Maithani "Paras" 
         Editor YOUTH ICON 
















Thursday, 9 January 2014


IBN 7  के Ashutosh भी "आम आदमी पार्टी" के हुए  ! 

 IBN 7  न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष भी "अब डंके की चोट" पर पत्रकारिता छोड़ "आम आदमी पार्टी" में शामिल हो गए हैं , अच्छी  बात है। लेकिन जितनी तेजी से पत्रकार बिरादरी के लोग इस पार्टी में शामिल हो रहे हैं उससे विकल्प के तौर पर इस पार्टी का नाम "आम पत्रकार पार्टी" भी हो जाय तो बुरा क्या है।  खैर ये तो रही मामूली सी ठिठोली।  अब एक आशंका मेरे मन में पैदा  हो रही है इस पार्टी के भविष्य को लेकर , क्योंकि इस पार्टी में कुनबे की शुरुआत आप लोग भी पिछले दिनों में देख ही रहे होंगे कि एक से बढ़कर एक नामी उद्योगपतियों , पत्रकारों , कवियों, साहित्यकारों ,हाशिये पर डाले गए राजनितिक परिवारों के लोगों से हो रही है। हालांकि इसमें बुराई या एतराज जैंसी भी कोई बात नहीं होनी चाहिए।  लेकिन जिस तरह से एक नहीं बल्कि अनेक नामचीन शख्शियतें इस पार्टी में शामिल हो गयीं हैं तो आगे इस बात की भी कोई गारण्टी नहीं होगी कि इनके अपने - अपने अहम् आपस में टकरा ना जाएं और तब सीधा -सीधा नुकसान पार्टी के मूल उद्देश्यों को पहुचना तय है।  और जैसे ही  पार्टी भी फूट पड़ेगी तो फिर एक नई पार्टी जन्म ले लेगी जिसका नाम होगा "आम पत्रकार पार्टी" । 
लेकिन यह सिर्फ एक आशंका मात्र है। 
वहीं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के लिए भी एक बड़ी चिंता की बात है कि अगर इस तरह से पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ एक-एक कर नेता बनने चल देंगे तो यहाँ की कमान किसके हाथों में होगी।  आशुतोष की बेबाकी से की जाने वाली पत्रकारिता , योगेन्द्र यादव की सटीक राजनीतिक समीक्षा , और शाजिया इल्मी की उत्कृष्ठ शैली की एंकरिंग क्या अब कभी देखने या सुनने को नहीं मिलेगी ? 
अपने नामचीन पत्रकारों से अनुरोध कि कृपया इस स्थान को रिक्त न करें आप लोग इस क्षेत्र में रह कर भी समाज और राजनीति की दिशा और दशा बदलने में सक्षम हैं।  आपकी जरुरत यहाँ ज्यादा है।    

आशुतोष जी ने पूरा मन बना ही लिया है नेता बनने का तो "पत्रकार" से नेता बनने पर हमारी ओर से हार्दिक बधाई ।   अब आशुतोष के तीखे सवालों से नेताओं को दो-चार नहीं होना पड़ेगा , बल्कि अब तो  दो-चार नेता मिलकर नेता आशुतोष से भिड़ने के मूड़ में होंगे  ..... :) :) 
आशुतोष की अगली पारी का हैम सभी को बेसब्री से इन्तजार है।  

Shashi Bhushan Maithani "paras" 
Editor YOUTH ICON Yi Media
09756838527 , 09412029205
shashibhushan.maithani@gmail.com 
शशि भूषण मैठाणी "पारस" सम्पादक Yi  मीडिया 
Please Visit -
www.youthicon.co.in 

Sunday, 30 June 2013

YOUTH ICON: ऊपर दो तस्बीरें देखिये पहली तस्बीर 40 के दशक की ब...

YOUTH ICON:
ऊपर दो तस्बीरें देखिये पहली तस्बीर 40 के दशक की ब...
: ऊपर दो तस्बीरें देखिये पहली तस्बीर 40 के दशक की बताई गयी तो दूसरी 17 जून 2013 की     * SHASHI BHUSHAN MAITHANI "PARAS" ...

YOUTH ICON: नन्दा देवी यात्रा को लोक-पारम्परिक पूजा तक ही सीमि...

YOUTH ICON: नन्दा देवी यात्रा को लोक-पारम्परिक पूजा तक ही सीमि...: By. Shashi Bhushan Maithani "paras"  नन्दादेवी यात्रा को लोक-पारम्परिक पूजा तक ही सीमित रहने दें ।  हिमालयी कुम्भ क...

नन्दा देवी यात्रा को लोक-पारम्परिक पूजा तक ही सीमित रहने दें ।


By. Shashi Bhushan Maithani "paras" 



नन्दादेवी यात्रा को लोक-पारम्परिक पूजा तक ही सीमित रहने दें । 
हिमालयी कुम्भ की नहीं बल्कि राजनीतिक कुम्भ की ज्यादा आहट नंदा देवी राजजात यात्रा में । 

"नंदा देवी राजजात यात्रा के व्यापक स्तर के बजाय सरकार को हर वर्ष सैकड़ों गाँवों में नन्दाष्टमी से आयोजित होने वाले नन्दा उत्सवों को ज्यादा प्रोत्साहन देना चाहिए जो कि तीन दिन से लेकर एक सप्ताह तक के नन्दा उत्सव होते हैं , जो सिर्फ विभिन्न गांवो की अपनी - अपनी  सीमाओं तक ही सीमित होती हैं । जिसमे किसी भी तरह के जोखिम की संभावना न के बराबर रहती है ।  और इससे राज्य के सैकड़ों गांवों के पारम्परिक धार्मिक तीर्थाटन को मजबूती हिमांचल प्रदेश के दशहरा पर्व , महराष्ट्र के गणपति उत्सव आदि की तर्ज पर मिल सकेगा और नंदा पाती , स्योलापाती ,ब्युडा पाती ,नन्दा कौथिग , नन्दा लोकजात ,हर वर्ष आयोजित होने वाले उत्सव हैं " ।

आज मुख्यमंत्री बहुगुणा जी ने एक जोरदार अपील की है नंदा देवी राजजात के सन्दर्भ में , उन्होंने नंदा देवी राजजात उत्सव को बड़े ही शादगी व पारम्परिक तरीके से अपने - अपने क्षेत्रों अर्थात सीमित ग्रामीण क्षेत्रों की सीमाओं के अन्तर्गत मनाने की अपील पर्वतीय समाज के लोगों से की है । 
मुख्यमन्त्री  की जनता से की गई इस अपील पर , मुझे ज्यादा ख़ुशी हुई , वह इसलिए कि मैंने अपने 18 जून को लिखे गए अपने ब्लॉग में सबसे पहले यही चिंता ब्यक्त की थी ,  कि अब हमारे सामने बेहद निजी लोक-पारम्परिक पूजा जो कि कुछ ही गांवों की है , जिसे अब राजनीतिक चतुराइयों के साथ विश्व मानचित्र पर उकेरने की तैयारी में अरबों रूपये को ठिकाने लगाने का खेल शुरू हो गया है और हिमालय में यात्रियों को दी जानी वाली सुख - सुविधाएं सिर्फ सरकारी फाईलों में ही सजी रहेंगी । 
मैंने अपने लेख में इस बात  पर चिन्ता व्यक्त की थी कि अगर केदार नाथ जैंसा हाल हुआ तो सरकार की क्या ऐसी विभीषिका से निपटने की कोई तैयारी है भी या नहीं ? आखिर आप किस आत्मविश्वास के भरोशे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से लोगों को यहाँ दुर्गम हिमालयी यात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित कर रहे हो ? 
मै " अमर उजाला " का  विशेष धन्यवाद ज्ञापित करूँगा कि उन्होंने तुरन्त इस मुददे की गम्भीरता को भाँपते हुवे सबसे पहले उठाया । अमर उजाला ने 19 जून को ही मेरे ब्लॉग का हवाला देते हुए खबर को प्रकाशित किया था ।  जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - 

और मीडिया को इस समय इस मुददे को पुरजोर तरीके से और अधिक व्यापकता के साथ उठाने की जरुरत है , मै बार - बार कह रहा हूँ कि नन्दा देवी पूजा हिमालयी क्षेत्रों खाशकर चमोली , अल्मोड़ा , नैनीताल आदि जनपदों के कुछ ही गांवों की बेहद निजी ,पारंपरिक व दोषमुक्त पूजा है । जिसे नंदा पाती , स्योलापाती ,ब्युडा पाती ,नन्दा कौथिग , नन्दा लोकजात , एवं नन्दा राजजात के रूप में मनाये जाने का विधान है परन्तु यह किसी एक गाँव से संचालित होने वाली यात्रा नहीं है बल्कि जिसे आज कुछ तथाकथित राजनीतिक पहुँच रखने वाले विद्वानों द्वारा बहुप्रचारित किया जा रहा है । ऐसे भ्रामक स्थिति में कई बार तो टकराव की स्थिति भी क्षेत्र बन रही हैं , खाशकर चमोली जनपद के घाट विकासनगर में, जंहा वाकही नंदा देवी का सिद्ध पीठ मन्दिर मौजूद है और हर वर्ष नंदा उत्सव और नंदा लोकजात यात्रा को बेहद ही पारम्परिक व धार्मिक अनुष्ठान के साथ मनाया जाता है । 
अब जरुरत है एक ऐसी विकास परक सोच की जो हिमालयी पर्यावरणीय संरक्षण के साथ आगे बढे।  नंदा देवी राजजात यात्रा के व्यापक स्तर के बजाय सरकार को हर वर्ष सैकड़ों गाँवों में नन्दाष्टमी से आयोजित होने वाले नन्दा उत्सवों को ज्यादा प्रोत्साहन देना चाहिए जो कि तीन दिन से लेकर एक सप्ताह तक के नन्दा उत्सव होते हैं , जो सिर्फ विभिन्न गांवो की अपनी - अपनी तक में सीमित होती हैं । जिसमे किसी भी तरह के जोखिम की संभावना न के बराबर रहती है ।  और इससे राज्य के सैकड़ों गांवों के पारम्परिक धार्मिक तीर्थाटन को मजबूती हिमांचल प्रदेश के दशहरा पर्व , महराष्ट्र के गणपति उत्सव आदि की तर्ज पर मिल सकेगा और नंदा पाती , स्योलापाती ,ब्युडा पाती ,नन्दा कौथिग , नन्दा लोकजात ,हर वर्ष आयोजित होने वाले उत्सव हैं । पर सरकार को किसी भी गाँव विशेष को खाश आर्थिक मदद देने के बजाय नंदा उत्सव वाले गांवों को चिन्हित कर वहाँ अच्छी सड़कें ,बिजली पानी व स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या करवानी चाहिए । ऐसा करने से मात्र एक क्षेत्र के बजाय भिन्न - भिन्न गांवो को सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल सकेगा । साथ ही चार धामों पर बढ़ते जनदबाव में भी भारी कमी आ सकेगी और देश विदेश से आने वाले श्रद्धालु सुनियोजित एवं  व्यवस्थित तरीके से उत्तराखंड में भ्रमण भी कर सकेंगे ।  केदारनाथ में इस महाप्रलय के लिए अनियोजित यात्रा को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जायेगा । और अब आने वाले समय में नन्दादेवी राजजात यात्रा के लिए भी सरकार को गम्भीरता से सोचने की जरुरत है । 

लेख - शशि भूषण मैठाणी "पारस"  स्वतन्त्र  पत्रकार ।   
09412029205, 09756838527 
shashibhushan.maithani@gmail.com 
  

Sunday, 23 June 2013

अब पौड़ी के थलीशैंण ब्लॉक में बारिश से तबाही की खबर ! सुनिए लाइब फोन वार्ता में वहां का हाल जो बता रहे हैं आशीष गोदियाल ।

Breaking News -  कल रात हुई भारी बारीश के चलते अब पौड़ी जनपद के थलिशैंण तहशील के पैठाणी ईलाके से मुलुंड , कोठी पाटुली सहित अन्य गांवो से लोगो के खेत , छानिया , घरों व मवेशियों के बहने की खबर है , मुझे यह जानकारी वहीँ के स्थानीय निवासी आशीष गोदियाल जी ने दी है आशीष ने बताया कि लोग भारी दहशत में है और सुरक्षित स्थानों पर  चले गए हैं । यह भी बताया गया है काफी संख्या में लोगों की छानियां बह गयी है , दरअसल उत्तराखंड में लोग निचले हिस्सों से जब उपरी जंगल के ईलाकों में गर्मियों व बरसात के सीजन में प्रवास करते हैं इस दौरान जंगलों में बने घरों को स्थानीय भाषा में छानियां कहते हैं , यही सबसे बड़ी चिंता की बात भी है जो आशीष ने फोन पर हमें बताया कि ईलाके के कई गांवो से छानिया बहने की खबर है । (क्या है पौड़ी के थलीशैंण तहशील का हाल सुनिए स्थानीय निवासी आशीष के साथ लाइव फोन इन में ) - शशि भूषण मैठाणी "पारस"  Yi मीडिया  09412029205 , 09756838527  

अब पौड़ी के थलीशैंण ब्लॉक में बारिश से तबाही की खबर ! सुनिए लाइब फोन वार्ता में वहां का हाल जो बता रहे हैं आशीष गोदियाल ।  

Friday, 21 June 2013


नेपालियों का केदारनाथ में आतंक ...| 
नेपाली मजदूर रात में लड़कियों को ढूढ़ ढूंढ कर ले जा रहे हैं ..|

लगातार पिछले 3 - 4 दिनों से उत्तराखण्ड के सभी लोग इस खबर से ब्यथित थे की स्थानीय लोग ऐसा कर रहे हैं लेकिन देहरादून जौलीग्रांट हवाई अड्डे पर केदारनाथ से लौटी बिहार की महिला ने जो बाते बताई हैं वह रुला देने वाली हैं उनका कहना है नेपाली मजदूर रात में लड़कियों को ढूढ़ - ढूंढ कर ले जा रहे हैं उन्ही के सामने उनकी बेटी को तीन नेपालियों ने नोछ डाला जंगल में शरण लिए इस महिला और उसकी बेटी ने जब शोर मचाया तो आस पास के लोगों ने टार्च मारी इतने में  नेपाली भाग खड़े हुवे महिला का कहना है कि उनकी बेटी अब खुद मुझसे यानी अपनी माँ से भी नजर नहीं मिला पा रही है । 
एक और महिला ने बताया कि अन्धेरा होते ही वह अकेली महिला या जवान लड़कियों को ज्यादा अपने हवश का शिकार बना रहे हैं साथ में पुरुष भी अपने बच्चों को नहीं बचा पा रहे हैं क्योंकि सभी घायल बीमार हो चुके हैं , किसी में ताकत नहीं रह गयी अब है इसका फायदा नेपाली मजदूर जमकर उठा रहे हैं । महिला ने कहा कि सेना या पुलिस की टीमों को रात की गस्त के लिए वहाँ जंगलों में उतारा जाय और तेज फोकश लाईटों वाली टार्च भी दी जाय अभी भी हजारों महिलाये , लडकियां वह अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं । 
मैंने कल ही अपने ब्लॉग youthiconinfo.blogspot.in में लिखा था कि उत्तराखंडी पहाड़ी कभी भी ऐसी नीच और ओछी हरकत नहीं कर सकता है । 
ध्यान दीजिये सरकार -जो किसी को पता नहीं वह हम बता रहे हैं -  
केदारनाथ से नागनाथ पोखरी के लिए ऊपर ही ऊपर जंगलों से पैदल रास्ते होते हुवे पहले बुजुर्ग केदारनाथ यात्रा पर जाया करते थे । कल शाम को ही मुझे बताया गया है कि पुराने रास्तों का फायदा इस समय नेपाली उठा रहे हैं केदारनाथ में सेना के पहुंचते ही यह चोर जंगलों के रास्ते भाग रहे हैं जो कि अखोड़ी- मच्खंडी -त्रिसूला के जंगलो से होते हुए नागनाथ - पोखरी - से फिर नंदप्रयाग, लंगासू, घुडसाल ,सैकोट, सोनला ,बछेर ,और  मैठाना आदि जगहों पर पहुँच रहे हैं या कुछ जगह अभी पहुँच सकते हैं , कल शाम को ही कई नेपाली मजदूर और घोड़े खच्चर वाले केदारनाथ से पोखरी होते चोपता से पहले के जंगलो से होते हुए मण्डल और फिर गोपेश्वर मण्डल में भी पहुँच चुके है , लेकिन सभी पर संदेह करना भी सही नहीं होगा । 
अब जरुरत है - 
ऐसे में चमोली गोपेश्वर पुलिस , कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग चौकी पुलिस , रुद्रप्रयाग पुलिस या राजस्व क्षेत्रों में पटवारियों को निर्देशित किया जाय कि जो नेपाली मजदूर या घोड़े खच्चर वाले जंगलो से होते हुए केदारनाथ से निकल रहे हैं उनकी गहनता से जांच की जाय क्योंकि यह भी बताया जा रहा है कि लूट खशोट की नियत से भी इन्होने यात्रियों को मौत के घाट उतारा है और भाग रहे हैं जो हैलिकाफ्टर से भी नहीं आना चाहेंगे। यह एक महिला पीडिता ने बताया कि केदारनाथ के जंगलों में रात में टार्च से ढूंढ ढूंढ कर नेपालियों ने लोगों से रूपये और गहने निकाले हैं और हाथों में अजीब से चाकू जैसे हथियार भी इनके पास देखे गए कुछ ने बिरोध किया तो उन्हें मारा भी गया है । 
कृपया चमोली - रुद्रप्रयाग और टिहरी जिलाप्रशासनो को निर्देशित किया जाय कि जंगलो के रास्ते भाग रहे नेपालियों को पकड़ने के लिए अलग से टीम गठित की जाय स्वयम सेवी संस्थाएं और ग्रामीण लोग भी इनकी धरपकड़ कर पुलिस को सौपें तो बहुत ही नेकी का काम होगा । 

शशि भूषण मैठाणी "पारस"
09412029205
09756838527
shashibhushan.maithani@gmail.com